balkand बालकाण्ड ramcharit manas 1-7

balkand बालकाण्ड ramcharit manas

krishna bhakti store team

7/18/20261 min read

श्री हरि

बंदउँ गुरु पद पदुम परागा।

सुरुचि सुबास सरस अनुरागा॥

अमिअ मूरिमय चूरन चारू।

समन सकल भव रुज परिवारू॥ १ ॥

अर्थ: मैं गुरु महाराज के चरणकमलों की रज की वन्दना करता हूँ, जो सुरुचि (सुन्दर स्वाद), सुगन्ध तथा अनुरागरूपी रस से पूर्ण है। वह अमर मूल (सञ्जीवनी जड़ी) का सुन्दर चूर्ण है, जो सम्पूर्ण भवरोगों के परिवार को नाश करने वाला है।

दूसरी चौपाई (चौ० २)

सुकृति संभु तन बिमल बिभूती। मंजुल मंगल मोद प्रसूती॥ जन मन मंजु मुकुर मल हरनी। किएँ तिलक गुन गन बस करनी॥ २ ॥

अर्थ: वह रज सुकृती (पुण्यवान् पुरुष) रूपी शिवजी के शरीर पर सुशोभित निर्मल विभूति है और सुन्दर कल्याण और आनन्द की जननी है, भक्त के मनरूपी सुन्दर दर्पण के मैल को दूर करने वाली और तिलक करने से गुणों के समूह को वश में करने वाली है।

६. तीसरी चौपाई (चौ० ३)

श्रीगुर पद नख मनि गन जोती।

सुमिरत दिब्य दृष्टि हियँ होती॥

दलन मोह तम सो सप्रकासू।

बड़े भाग उर आवइ जासू॥ ३ ॥

अर्थ: श्रीगुरु महाराज के चरण-नखों की ज्योति मणियों के प्रकाश के समान है, जिसके स्मरण करते ही हृदय में दिव्य दृष्टि उत्पन्न हो जाती है। वह प्रकाश अज्ञानरूपी अन्धकार का नाश करने वाला है; वह जिसके हृदय में आ जाता है, उसके बड़े भाग्य हैं।

पिछली चौपाई का अंतिम अंश (चौ० ४)

उघरहिं बिमल बिलोचन ही के।

मिटहिं दोष दुख भव रजनी के॥

सूझहिं राम चरित मनि मानिक।

गुपुत प्रगट जहँ जो जेहि खानिक॥ ४ ॥

अर्थ: (श्रीगुरु महाराज के चरणों की रज से) हृदय के निर्मल नेत्र खुल जाते हैं और संसाररूपी रात्रि के दोष-दुःख मिट जाते हैं एवं श्रीरामचरित्ररूपी मणि और माणिक्य, गुप्त और प्रकट जहाँ जो जिस खान में हैं, सब दिखायी पड़ने लगते हैं।

२. पहला दोहा (दो० १)

दो०- जथा सुअंजन अंजि दृग साधक सिद्ध सुजान।

कौतुक देखत सैल बन भूतल भूरि निधान॥ १ ॥

अर्थ: जैसे सिद्धाञ्जन को नेत्रों में लगाकर साधक, सिद्ध और सुजान पर्वतों, वनों और पृथ्वी के अन्दर कौतुक से ही बहुत-सी खानें देखते हैं।

३. पहली चौपाई (चौ० १)

गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन।

नयन अमिअ दृग दोष बिभंजन॥

तेहिं करि बिमल बिबेक बिलोचन।

बरनउँ राम चरित भव मोचन॥ १ ॥

अर्थ: श्रीगुरु महाराज के चरणों की रज कोमल और सुन्दर नयनामृत-अञ्जन है, जो नेत्रों के दोषों का नाश करने वाला है। उस अञ्जन से विवेकरूपी नेत्रों को निर्मल करके मैं संसाररूपी बन्धन से छुड़ाने वाले श्रीरामचरित्र का वर्णन करता हूँ।

४. दूसरी चौपाई (चौ० २)

बंदउँ प्रथम महीसुर चरना।

मोह जनित संसय सब हरना॥

सुजन समाज सकल गुन खानी।

करउँ प्रनाम सप्रेम सुबानी॥ २ ॥

अर्थ: पहले पृथ्वी के देवता ब्राह्मणों के चरणों की वन्दना करता हूँ, जो अज्ञान से उत्पन्न सब सन्देहों को हरने वाले हैं। फिर सब गुणों की खान सन्त-समाज को प्रेमसहित सुन्दर वाणी से प्रणाम करता हूँ।

५. तीसरी चौपाई (चौ० ३)

साधु चरित सुभ चरित कपासू।

निरस बिसद गुनमय फल जासू॥

जो सहि दुख परछिद्र दुरावा।

बंदनीय जेहिं जग जस पावा॥ ३ ॥

अर्थ: सन्तों का चरित्र कपास के चरित्र (जीवन) के समान शुभ है, जिसका फल नीरस, विशद और गुणमय होता है। (कपास की डोडी नीरस होती है, सन्त-चरित्र में भी विषयासक्ति नहीं है, इससे वह भी नीरस है; कपास उज्ज्वल होता है, सन्त का हृदय भी अज्ञान और पापरूपी अन्धकार से रहित होता है, इसलिये वह विशद है, और कपास में गुण (तन्तु) होते हैं, इसी प्रकार सन्त का चरित्र भी सद्गुणों का भण्डार होता है, इसलिये वह गुणमय है।) जैसे कपास का धागा सूई के किये हुए छेद को अपना तन देकर ढक देता है, अथवा कपास जैसे लोढ़े जाने, काते जाने और बुने जाने का कष्ट सहकर भी वस्त्र के रूप में परिणत होकर दूसरों के गोपनीय स्थानों को ढकता है, उसी प्रकार सन्त स्वयं दुःख सहकर दूसरों के छिद्रों (दोषों) को ढकता है, जिसके कारण उसने जगत् में वन्दनीय यश प्राप्त किया है।

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