balkand बालकाण्ड ramcharit manas

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krishna bhakti store team

7/18/20261 min read

श्री हरि

१. पहला श्लोक

वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि।

मङ्गलानां च कर्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ १ ॥

अर्थ: अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों और मङ्गलों की करने वाली सरस्वती जी और गणेश जी की मैं वन्दना करता हूँ।

२. दूसरा श्लोक

भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ। याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तःस्थमीश्वरम्॥ २ ॥

अर्थ: श्रद्धा और विश्वास के स्वरूप श्रीपार्वती जी और श्रीशङ्कर जी की मैं वन्दना करता हूँ, जिनके बिना सिद्धजन अपने अन्तःकरण में स्थित ईश्वर को नहीं देख सकते।

३. तीसरा श्लोक

वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शङ्कररूपिणम्।

यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते॥ ३ ॥

अर्थ: ज्ञानमय, नित्य, शङ्कररूपी गुरु की मैं वन्दना करता हूँ, जिनके आश्रित होने से ही टेढ़ा चन्द्रमा भी सर्वत्र वन्दित होता है।

४. चौथा श्लोक

सीतारामगुणग्रामपुण्यारण्यविहारिणौ।

वन्दे विशुद्धविज्ञानौ कवीश्वरकपीश्वरौ॥ ४ ॥

अर्थ: श्रीसीतारामजी के गुणसमूहरूपी पवित्र वन में विहार करने वाले, विशुद्ध विज्ञानसम्पन्न कवीश्वर (वाल्मीकि जी) और कपीश्वर (श्रीहनुमान् जी) की मैं वन्दना करता हूँ।

५. पाँचवाँ श्लोक

उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम्।

सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम्॥ ५ ॥

अर्थ: उत्पत्ति, स्थिति (पालन) और संहार करने वाली, क्लेशों की हरने वाली तथा सम्पूर्ण कल्याणों को करने वाली श्रीरामचन्द्रजी की प्रियतमा श्रीसीताजी को मैं नमस्कार करता हूँ।

६. छठा श्लोक

यन्मायावशवर्ति विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवासुरा

यत्सत्त्वादमृषैव भाति सकलं रज्जौ यथाहेर्भ्रमः।

यत्पादप्लवमेकमेव हि भवाम्भोधेस्तितीर्षावतां

वन्देऽहं तमशेषकारणपरं रामाख्यमीशं हरिम्॥ ६ ॥

अर्थ: जिनकी माया के वशीभूत सम्पूर्ण विश्व, ब्रह्मादि देवता और असुर हैं; जिनकी सत्ता से रस्सी में सर्प के भ्रम की भाँति यह सारा दृश्य-जगत् सत्य ही प्रतीत होता है और जिनके केवल चरण ही भवसागर से तरने की इच्छा वालों के लिये एकमात्र नौका हैं, उन समस्त कारणों से पर (सब कारणों के कारण और सबसे श्रेष्ठ) राम कहलाने वाले भगवान् हरि की मैं वन्दना करता हूँ।

७. सातवाँ श्लोक

नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद्

रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि।

स्वान्तःसुखाय तुलसी रघुनाथगाथा-

भाषानिबन्धमतिमञ्जुलमातनोति॥ ७ ॥

अर्थ: अनेक पुराण, वेद और [तन्त्र] शास्त्र से सम्मत तथा जो रामायण में वर्णित है और कुछ अन्यत्र से भी उपलब्ध श्रीरघुनाथजी की कथा को तुलसीदास अपने अन्तःकरण के सुख के लिये अत्यन्त मनोहर भाषा रचना में विस्तृत करता है।