Brihadaranyaka Upanishad Sanskrit-Hindi Edition By Gita Press | बृहदारण्यकोपनिषद् (सटीक एवं प्रामाणिक )

शुक्ल यजुर्वेदीय परंपरा का सबसे विशाल और प्रधान उपनिषद; मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, अन्वय और पूज्य पाद श्रीशंकराचार्य जी के भाष्य के मर्म को समझाती सरल हिंदी व्याख्या। (The most sacred, ancient, and comprehensive edition of the Brihadaranyaka

₹280.00

गीता प्रेस, गोरखपुर (Gita Press Gorakhpur) द्वारा प्रकाशित "बृहदारण्यकोपनिषद्" (Brihadaranyaka Upanishad Hindi Book) सनातन धर्म, अद्वैत वेदान्त दर्शन और उपनिषद साहित्य का सर्वोपरि, जाग्रत और सबसे विशाल महाग्रंथ है। यह उपनिषद शुक्ल यजुर्वेद के शतपथ ब्राह्मण का अंतिम भाग है। अपने नाम के ही अनुरूप—'बृहद्' यानी अत्यंत विशाल और 'अरण्यक' यानी एकांत वन में मनन करने योग्य; यह संपूर्ण अध्यात्म जगत का सबसे गंभीर प्रकाश-स्तंभ है, जिसमें आत्मज्ञान, ब्रह्मतत्त्व और मोक्ष के रहस्यों का अगाध समुद्र समाया हुआ है।

आज के इस आधुनिक, अत्यधिक तनावपूर्ण, और मानसिक अशांति से भरे युग में, जहाँ मनुष्य जीवन के वास्तविक उद्देश्य को भूलकर अवसाद (Depression) और सांसारिक दुखों में उलझा हुआ है, यह महाग्रंथ बुद्धि को सात्विक विवेक देने वाली अचूक संजीवनी है। गीता प्रेस की प्रामाणिकता के अनुसार, इसके अत्यंत कठिन और गूढ़ दार्शनिक रहस्यों को सरल, सुबोध और प्रवाहमयी हिंदी भाषा में प्रस्तुत किया गया है। पुस्तक में प्रत्येक मन्त्र का मूल संस्कृत पाठ, पदच्छेद (Word Separation), अन्वय (Sentence Order) और सटीक अनुवाद दिया गया है, ताकि साधारण पाठक, वेदान्त के विद्यार्थी और शोधार्थी (Scholars) भी ऋषियों की दिव्य चेतना को आसानी से समझ सकें।

🔑 पुस्तक के मुख्य विषय और आध्यात्मिक लाभ (Core Highlights):

  • 'अहं ब्रह्मास्मि' (Aham Brahmasmi) महावाक्य का उद्गम: इस उपनिषद में सनातन धर्म के चार महावाक्यों में से एक—"अहं ब्रह्मास्मि" (मैं ही ब्रह्म हूँ) का प्रतिपादन किया गया है, जो जीव और ईश्वर की एकता का सर्वोच्च शिखर है।

  • महर्षि याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी का अमर संवाद: इस ग्रंथ में महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा अपनी पत्नी मैत्रेयी को दिया गया परम पावन उपदेश है, जिसमें वे समझाते हैं कि संसार की कोई भी वस्तु अपने लिए प्रिय नहीं होती, बल्कि आत्मा के लिए ही सब प्रिय होता है। अमरता का यही वास्तविक साधन है।

  • राजा जनक की दार्शनिक राजसभा: महाराजा जनक और याज्ञवल्क्य जी के बीच हुए गूढ़ आध्यात्मिक प्रश्नोत्तर, तथा गार्गी और याज्ञवल्क्य का वह प्रसिद्ध शास्त्रार्थ जो ब्रह्मविद्या की श्रेष्ठता को सिद्ध करता है।

  • पवित्र 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' प्रार्थना: विश्वप्रसिद्ध पावन प्रार्थना "असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्माऽमृतं गमय" इसी उपनिषद की देन है, जो मनुष्य को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाती है।

  • उच्च शास्त्रीय मुद्रण: पुस्तक को बहुत ही सुंदर, आकर्षक और मजबूत कवर (Hardcover Edition) के साथ बड़े व स्पष्ट अक्षरों (Bold Typography) में मुद्रित किया गया है, जिससे नित्य नियम से स्वाध्याय (Daily Reading) करते समय आँखों पर बिल्कुल जोर नहीं पड़ता।

🎯 यह पुस्तक आपके स्टोर और पुस्तकालय के लिए क्यों अनिवार्य है?

  • सर्वोत्तम आध्यात्मिक उपहार (Spiritual Gifting): किसी भी विशेष मांगलिक अवसर, यज्ञ-अनुष्ठान, ज्ञान-यज्ञ, संन्यास-दीक्षा, गृह-प्रवेश या पूजनीय माता-पिता व ज्ञानपिपासु मित्रों के स्वाध्याय के लिए इससे कल्याणकारी, मूल्यवान और अर्थपूर्ण उपहार दूसरा कोई नहीं हो सकता।

यदि आप वेदों के वास्तविक ज्ञान-अमृत का रसास्वादन करना चाहते हैं, जीवन और मृत्यु के बंधनों से मुक्त होकर शाश्वत सत्य को जानना चाहते हैं, तो "बृहदारण्यकोपनिषद् (Sanskrit-Hindi Edition)" को आज ही अपने घर, पूजा-घर और व्यक्तिगत पुस्तकालय (Personal Library) का सर्वोच्च गौरव अवश्य बनाएं।


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